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दीप हूँ जलता रहूँगा

मैं अक्षय विश्वास का ले स्नेह संचय में असीमित  इस घने घिरते तिमिर से अहर्निश लड़ता रहूँगा  दीप  हूँ जलता रहूँगा 
बह रहीं मेरी शिराओं में अगिन प्रज्ज्वल शिखाएं  साथ देती है निरंतर नृत्य करती वर्तिकाएं  मैं अतल ब्रह्माण्ड के शत  कोटि नभ का सूर्यावंशी  जाग्रत मुझ से हुई हैं चाँद में भी ज्योत्स्नायें 
मैं विरासत में लिए हूँ ज्योति का विस्तार अपरिम  जो  ,मिले दायित्व हैं  निर्वाह वह  करता रहूँगा  दीप  हूँ जलता रहूँगा 
हैं मुझी से जागती श्रद्धाविनित  आराधनाएं  और मंदिर में सफल होती रही अभ्यर्थनाएँ  मैं बनारस में सुबह का मुस्करा  आव्हान करता सांझ मेरे साथ सजती है अवध की वीथिकाएँ
मैं  रहा आराध्य इक भोले शलभ की अर्चना का प्रीतिमय बलिदान को उसके अमर करता रहूंगा  दीप हूँ  जलता रहूंगा 
साक्ष्य में मेरे बँधे   रंगीन धागे मन्नतों के सामने मर्रे जुड़े संबंध शत जन्मान्तरों के में घिरे नैराश्य में हूँ संचरित आशाएं बनकर में रहा हूँ आदि से, हर पृष्ठ पर मन्वंतरों के
मैं रहा स्थिर, और मैं ही अनवरत गतिमान प्रतिपल  काल की सीमाओं के भी पार मैं चलता रहूँगा  दीप  हूँ, जलता रहूँगा 

सुधियों के मेरे आंगन में

किसने अलगोजा बजा दिया, मेरी सांसों के तार छेड़ ये कौन सुरभियां बिखराता, सुधियों के मेरे आंगन में
उषा की पहली जगी किरन की ताजा ताजा छुअन लिये पांखुर से फ़िसले तुहिन कणों की गतियों से चलता चलता  झीलों की लहरों के कंपन जैसे चूनर को लहराता ये कौन उमंगों में आकर नूतन उल्लास रहा भरता
निस्तब्ध शांत संध्याओं का  छाया सन्नाटा तोड़ तोड़ किसने इकतारा बजा दिया मेरे जीवन के आंगन में
वातायन में आकर किसने रंग डाले इन्द्रधनुष इतने पाटल पर उभरी हैं फ़िर से कुछ प्रेम कथा इतिहासों की जुड़ गये अचानक नये पृष्ठ इक संवरे हुये कथानक में राँगोली रँगी कल्पना ने , भूले बिसरे मधुमासों की
किसके आने की है आहट जो टेर बनी बांसुरिया की किसने पैझनियाँ थिरकाईं, मन के मेरे वृन्दावन में
किसकी पगतालियाँ की छापें रँग रही अल्पनाये अदभुत  सपनो की दहलीजों से ले सूने मन की चौपालों तक है किसका यह आभास मधुर लहराता हुआ हवाओं में ये कौन मनोरम   प्रश्न बना दे रहा हृदय पर आ दस्तक
कस्तूरी मृग सा भटकाता है कौन मुझे यूं निशि वासर   किसके पग के नूपुर खनके, मन के इस नंदन कानन में 

जहां अनुराग पलता हो

चलेंबावले मन अब किसीअनजानबस्ती में
जहां अनुरागपलताहोसमन्वय से गले मिलकर
प्रतीक्षित दग्ध होकरतूरहेगा और अबकितना ​ अकल्पितद्धेषके झोंके निरंतर आये झुलसाते ​उगीहै राजपथ पर नित नई इर्ष्याओं की बेलें जिधर भी देखता है तूघने कोहरे नजर आते
​चलें चल छोड़ दें ये घर

जिस्र आज ने फिर दुहराया

मन उदास हैहो निढाल बस सोफे पर लेता अलसाया
ये ही तो हालत कल की थीजिस्र आज ने फिर दुहराया
दिन उगता घुटनों के बल चल संध्या को जल्दी सो जाता
मौन खड़े पत्ते शाखों पर कोई कुछ भी कह न पाता
खिड़की की चौखट कोथामे खड़ी धूप बीमार सिसकती अँगनाई की पलक प्रतीक्षा का हर पल उत्सुक रह जाता ​
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पता नहीं चलता कब आकर रजनी ने  आँचल फहराया ऐसे ही कल की थी हालत जिसे आज ने फिर दोहराया ​


दूर क्षितिज तक जा पगडण्डी रही लौटती दम को साधे
सूना मंदिर लालायित था कोई आकर कुछआराधे
हवा अजनबी पीठ फिराये खड़ी रही कोने में जाकर बढ़ता बोझा एकाकीपन का, ढो ढो झुकते है काँधे
ताका करतीदॄष्टि ​भाव की गुमसुम हो बैठी कृशकाया ऐसा ही तो कलबीताथा जिसे आज ने फिर दुहराया ​


संदेशों के जुड़ कर टूटे कटी पतंगों जैसे धागे
बढ़ती हुई अपेक्षा रह रह पल दो पल का सहचर मांगे
फ़ैली हुई​नजर ​की सीमा होती जाती और संकुचित हो निस्तब्ध प्रश्न केसूचक, बने घड़ी के दोनों कांटे
फौलादी होता जाता है पल पल सन्नाटा गहराया
ऐसे हुआ हाल कल भी था जिसे आज ने फिर दोहराया

मन का कब ईतिहास पढोगे

अनुत्तरित यह प्रश्न अभी तक कब बोलो तुम उत्तर दोगे
तन का तो भूगोल पढ़ लिया, मन का कब ईतिहास पढोगे 
युग बीते पर पाठ्यक्रमों में किया नही परिवर्तन  ​तू मने बने हुए हो बस अतीत के पृष्ठों में होकर के बन्दी मौसम बदले, ऋतुयें बदली, देशकाल की सीमाएं भी किन्तु तुम्हारी अंगनाई  ​की बदली नहीं घिरी   नौचंदी
बिख्री ​ हुइ मान्यताओ के अन्धकूप मे डूबे  हो तुम  बोलो नई  सुबह की अपने मन मे कब उजियास भरोगे ​
सिमटा रहा तुम्हारा दर्शन सिर्फ मेनका उर्वशियो में लोपी, गार्गी, मैत्रेयी को कितना तुमने समझा जाना दुष्यंती स्मृतियां सहेज कर, कच से रहे अर्थसाधक तुम यशोधरा का और उर्मिला का क्या त्याग कभी पहचाना
अनदेख करते आये हो बिम्ब समय के दर्पण वाला कटु यथार्थ की सच्चाई पर, बोलो कब विश्वास करोगे एकाकी जीवन की राहें होती है अतुकांत काव्य सी मन से मन के संबंधों की लय सरगम बन  कर सजती है  सहचर बनने को कर देता जब कोई जीवन को अर्पित पल पल पर सारंगी तब ही साँसों की धुन में बजती है 
जीवन का अध्याय तुम्हारा अर्थ, विषय से रहित गद्य सा इसको करके छंदबद्ध कब अलंकार अनुप्रास जड़ोगे 

तूमन केवल स्वप्न ही दिये

तुमने मुझको स्वप्न कुछ दिए
लेकिन तुमने स्वप्न ही दिए
​नील   गगन के परे सुवासित औ  ​पुष्पित  राहों  ​के  निज पाशों में  रखे बाँध कर हर पल उन  बाहों के  धवल चाँदनी  में अंगड़ाई ले, संदली हवा के  सांस सांस भर तृप्ति प्राप्त करती, बढ़ती चाहों के 
रहा खोजता मैं उत्तर, पर  तुमने केवल प्रश्न ही दिए 
प्रश्न स्वप्न की इस दुनिया का पथ है शुरू कहाँ से जो सभाव्य बताते उसको संभव करे जहाँ से प्रतिबिम्बो के आकारों के आयामों को नापें आदि अंत की रेखाओं का कर दें अंत कहाँ पे
मांगीमाल उत्तरों वाली तुमने मुझको यत्न ही  दिए
यत्न किये निशि वासर इन लंबी राहों पर चलते जिन पर कभी मंज़िलों के साये भी आ न पड़ते होते है आरम्भ, अंत  पर जिनका कही नहीं है और नीड भी संध्या के, पाथेयो में ही ढलते
परिणति की अभिलाषाओं को अंतशेष भी भग्न ही दिए
तूमन केवल स्वप्न ही दिये

रचना करती है अभिनंदन

क्षमता नहीं किसी में सुन ले उसके लेखन में गुंजायश सबका है अपना विज्ञापन
किस रचना को गया सराहा किसने देखे है सम्मेलन कौन शब्द दे करे उजागर किसी हृदय का अन्तर्वेदन  कहाँ कहाँ पर मिला मान है और छपी है कितनी पुस्तक आत्म प्रशंसा के सब  साधन 
किस रचना के योगदान पर कितने मंच रहै है निर्भर किस रचना  का शिल्प आनूठा हावी हुआ सभी के उपर  कितनी हुई संकलित अब तक और संकलन का कितनो के कितनी बार किया संपादन   
बीए एमए पी एच डी की कितनी सनद बटोरी अब तक भाषा औ व्याकरण कहां तक द्वारे आकर देते दस्तक आलोचक आ शीश झुकाते करते हैं साहित्यकार का सांझ सवेरे बस आराधन ऐसे अद्भुत स्वतःप्रशंसक का रचना करती अभिनंदन