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Showing posts from 2017

कहनी थी कुछ बात नई

तुम ने भी दुहराई कहनी थी कुछ बात नई 
"अच्छे दिन की आआस लगाए बीते बरस कई"
दिन तो दिन है कब होता है अच्छा और बुरा कोई कसौटी नही बताये खोटा और खरा दोष नजर का होता, होते दिन और रात वही अपनी एक असहमति का बस करते विज्ञापन अनुशासन बिन रामराज्य क्या, क्या तुगलक शासन मक्खन मिलता तभी दही जब मथती रहै रई 
भोर रेशमी, सांझ मखमली, दोपहरी स्वर्णिम फागुन में बासंती चूनर सावन में रिमझिम जितने सुंदर पहले थे दिन अब भी रहै वही 

जानता यह ​तो नही मन

क्या पता कल का सवेराधुंध की चादर लपेटे
या सुनहली धूप के आलिंगनों में जगमगाये या बरसते नीर में ​ भीगा हुआ हो मस्तियों में ​ जानता यह  ​तो   नही मन, किन्तु है सपने सजाये
स्वप्न, अच्छा दिन रहेगा आज के अनुपात में कल आज का नैराश्य संध्या की  ढलन में ढल सकेगा आज की पगडंडियां कल राजपथ सी सज सकेंगी और नव पाथेय पथ के हर कदम पर सज सकेगा
राह में अवरोध बन कर डोलती झंझाये कितनी और विपदाएं हजारों जाल है अपना बिछाये नीड का  ​ संदेश कोई  सांझ ढलती  ला  सकेगी  जानता यह भी नही मन स्वप्न है फिर भी सजाये 
​उंगलियां जो मुट्ठियों में  थाम कर चलते रहे हैं  आस की चादर बिछाई जिस गगन के आंगनों में  धूप के वातायनों तक दौड़ती पगडंडियों पर  क्या घिरेंगे शुष्क बादल ही बरसते सावनों में  प्रश्न  उठते हैं निरंतर भोर में, संध्या निशा में और कोई चिह्न भी न उत्तरों का नजर आये शून्य है परिणाम में या है अभीप्सित वांछित कुछ जनता यह भी नहीं मन, स्वप्न है फिर भी सजाये 

कलम से इस हथेली पर

अधूरी रह गई सौगंध, जब तुमने कहा मुझसे
कलम से इस हथेली पर समर्पण त्याग लि ​ख ​ देना

कथानक युग पुराना आज फिर दुहरा दिया तुमने
समर्पित हो अहल्या रह गई अभिशाप से  ​दंशित 
तपा सम्पूर्ण काया को धधकती आग से गुज ​री ​
मगर फिर भी रही  ​वैदेही  हर अधिकार से वंचित

कहाँ तक न्यायसंगत है कोई अनुबंध इक तरफ़ा
पुराना पृष्ठ फिर इतिहास का इक बार लिख देना

समर्पित हो , रहे हो तुम कभी इतना बताओ तो
पुरंदर तुम, शची का त्याग क्या इक बार पहचाना
पुरू अपने समय के सूर्य थे तुम घोषणा करते
कभी औशीनरी की उर व्यथा के मूल को जाना

चले हम आज जर्जर रीतियाँ सा ​री ​  बदल डालें
ज़रूरी है ह्रदय पर प्रेम और अनुराग लिख देना

कहो क्या प्रेम आधारित कभी होता है शर्तों  ​पर 
कहाँ मन से मिले मन में उठी हैं त्याग की बातें  ​समर्पण हो गया सम्पूर्ण जब भी प्रेम उपजा है  गए हैं बँध धुरी  से उस, समूचे दिन, सभी रातें 
कहाँ  जन्मांतर सम्बन्ध होते शब्द में सीमित  किशन-राधा सती-शिव का उदाहरण आज लिख देना 
कलम से ज़िंदगी में इक महकता बाग़ लिख देना 

जरा झलक मिल जाये

जरा झलक मिल जाये कमल वासिनी की यही आस ले पूजा की उपवास किये अभिलाषा के बीज बोये नित सपनो में और जलाकर दीवाली के रखे दिए 
सुबह आस की भर कर रखी प्यालियां ले ज्योतिषियों के सम्मुख रखा हथेली को हाथों की रेखा का मेल नक्षत्रों से वह करवा दे तो फिर सुख की रैली हो  दादी नानी से सुन रखा बचपन  में घूरे के भी दिन फिर जाते बरसों में तो संभावित। है अपना भी भाग्य खुले आज नही तो कल या शायद परसों में  
एक सवा मुद्रा का भोग लगाया नित सवा मनी फल का मन मे आभास लिए बीज बोये अभिलाषा के नग्नाई में और दीवाली जैसे दीपित किये दिये
 देते रहे दिलासा मन ही मन खुद को सदा विगत के कर्मो का फल मिलता है परे नील नभ के दूजे इक  अम्बर से इस जीवन को कोई नियंत्रित करता है  उसे रिझाने को रोजाना मंदिर जा  सुबह शाम जा आरतियों को गाते   हैं  एवज़ में पा जाएंगे हम झलक ज़रा   छोटी सी बस इक यह आस लगाते हैं 
माला के मनकों पर गिन गिन  कर हमने  पूरे आठ और सौ मंत्रोच्चार किये  ज़रा खनक मिल जाए स्वर्ण कंगनों की  सांझ सवेरे सपनों का विस्तार किये 

जर्जर हुई मान्यता अंधी श्रद्धाएं गई पिलाई हमें घुटी में बचपन की कर्महीन होकर भी इन राहों पर चल मिल जाया करती चौथाई छप्पन की

गीत की गरिमा भुला दूँ

बह रहे हैं शब्द आवारा निरंकुश काव्य जग में यह नहीं स्वीकार मुझको गीत की गरिमा भुला दूँ
उड़ रही हैं पंख के बिन अर्धकचरी कल्पनाये पद्य का ओढ़े मुखौटा ,कुछ हृदय  की भावनाएं संतुलित तो भाव हो ना पाए, बस दे नाम कविता भीख मांगी जा रही मिल जाए थोड़ी वाहवाहैं 
जो उड़ेले जा रहे तरतीब के बिन शब्द सन्मुख है नहीं स्वीकार मुझको, मैं उन्हें कविता बता दूँ 
दूर कितनी चल सके हैं शब्द अनुशासन नकारे बह सकेगी देर कितनी तोड़ कर नदिया किनारे लय गति और ताल से हो विमुख कविताये विरूपित कोशिशें कर ले भले कितनी छलावों के सहारे
बुलबुलो में जो बने वे चित्र टंकते भीत पर क्या मानते हो तुम तो आओ आज में भ्रम को मिटा दूं
छिन्नमस्ता मूर्तियां कब मंदिरों में सज सकी है छंदमुक्ता पद्य कृति कब याद की सीढी चढ़ी है जो सहज सम्प्रेष्य होता, शब्द वह लय में बंधा है साक्ष्य में यह बात गीता और मानस ने कही है
तर्क है यदि कुछ तुम्हारा,म तो बहो कुछ देर ले में  सत्य खुद तुमसे कहेगा आओ मैं दर्पण  दिखा दूँ 

दीप हूँ जलता रहूँगा

मैं अक्षय विश्वास का ले स्नेह संचय में असीमित  इस घने घिरते तिमिर से अहर्निश लड़ता रहूँगा  दीप  हूँ जलता रहूँगा 
बह रहीं मेरी शिराओं में अगिन प्रज्ज्वल शिखाएं  साथ देती है निरंतर नृत्य करती वर्तिकाएं  मैं अतल ब्रह्माण्ड के शत  कोटि नभ का सूर्यावंशी  जाग्रत मुझ से हुई हैं चाँद में भी ज्योत्स्नायें 
मैं विरासत में लिए हूँ ज्योति का विस्तार अपरिम  जो  ,मिले दायित्व हैं  निर्वाह वह  करता रहूँगा  दीप  हूँ जलता रहूँगा 
हैं मुझी से जागती श्रद्धाविनित  आराधनाएं  और मंदिर में सफल होती रही अभ्यर्थनाएँ  मैं बनारस में सुबह का मुस्करा  आव्हान करता सांझ मेरे साथ सजती है अवध की वीथिकाएँ
मैं  रहा आराध्य इक भोले शलभ की अर्चना का प्रीतिमय बलिदान को उसके अमर करता रहूंगा  दीप हूँ  जलता रहूंगा 
साक्ष्य में मेरे बँधे   रंगीन धागे मन्नतों के सामने मर्रे जुड़े संबंध शत जन्मान्तरों के में घिरे नैराश्य में हूँ संचरित आशाएं बनकर में रहा हूँ आदि से, हर पृष्ठ पर मन्वंतरों के
मैं रहा स्थिर, और मैं ही अनवरत गतिमान प्रतिपल  काल की सीमाओं के भी पार मैं चलता रहूँगा  दीप  हूँ, जलता रहूँगा 

सुधियों के मेरे आंगन में

किसने अलगोजा बजा दिया, मेरी सांसों के तार छेड़ ये कौन सुरभियां बिखराता, सुधियों के मेरे आंगन में
उषा की पहली जगी किरन की ताजा ताजा छुअन लिये पांखुर से फ़िसले तुहिन कणों की गतियों से चलता चलता  झीलों की लहरों के कंपन जैसे चूनर को लहराता ये कौन उमंगों में आकर नूतन उल्लास रहा भरता
निस्तब्ध शांत संध्याओं का  छाया सन्नाटा तोड़ तोड़ किसने इकतारा बजा दिया मेरे जीवन के आंगन में
वातायन में आकर किसने रंग डाले इन्द्रधनुष इतने पाटल पर उभरी हैं फ़िर से कुछ प्रेम कथा इतिहासों की जुड़ गये अचानक नये पृष्ठ इक संवरे हुये कथानक में राँगोली रँगी कल्पना ने , भूले बिसरे मधुमासों की
किसके आने की है आहट जो टेर बनी बांसुरिया की किसने पैझनियाँ थिरकाईं, मन के मेरे वृन्दावन में
किसकी पगतालियाँ की छापें रँग रही अल्पनाये अदभुत  सपनो की दहलीजों से ले सूने मन की चौपालों तक है किसका यह आभास मधुर लहराता हुआ हवाओं में ये कौन मनोरम   प्रश्न बना दे रहा हृदय पर आ दस्तक
कस्तूरी मृग सा भटकाता है कौन मुझे यूं निशि वासर   किसके पग के नूपुर खनके, मन के इस नंदन कानन में 

जहां अनुराग पलता हो

चलेंबावले मन अब किसीअनजानबस्ती में
जहां अनुरागपलताहोसमन्वय से गले मिलकर
प्रतीक्षित दग्ध होकरतूरहेगा और अबकितना ​ अकल्पितद्धेषके झोंके निरंतर आये झुलसाते ​उगीहै राजपथ पर नित नई इर्ष्याओं की बेलें जिधर भी देखता है तूघने कोहरे नजर आते
​चलें चल छोड़ दें ये घर

जिस्र आज ने फिर दुहराया

मन उदास हैहो निढाल बस सोफे पर लेता अलसाया
ये ही तो हालत कल की थीजिस्र आज ने फिर दुहराया
दिन उगता घुटनों के बल चल संध्या को जल्दी सो जाता
मौन खड़े पत्ते शाखों पर कोई कुछ भी कह न पाता
खिड़की की चौखट कोथामे खड़ी धूप बीमार सिसकती अँगनाई की पलक प्रतीक्षा का हर पल उत्सुक रह जाता ​
​ 
पता नहीं चलता कब आकर रजनी ने  आँचल फहराया ऐसे ही कल की थी हालत जिसे आज ने फिर दोहराया ​


दूर क्षितिज तक जा पगडण्डी रही लौटती दम को साधे
सूना मंदिर लालायित था कोई आकर कुछआराधे
हवा अजनबी पीठ फिराये खड़ी रही कोने में जाकर बढ़ता बोझा एकाकीपन का, ढो ढो झुकते है काँधे
ताका करतीदॄष्टि ​भाव की गुमसुम हो बैठी कृशकाया ऐसा ही तो कलबीताथा जिसे आज ने फिर दुहराया ​


संदेशों के जुड़ कर टूटे कटी पतंगों जैसे धागे
बढ़ती हुई अपेक्षा रह रह पल दो पल का सहचर मांगे
फ़ैली हुई​नजर ​की सीमा होती जाती और संकुचित हो निस्तब्ध प्रश्न केसूचक, बने घड़ी के दोनों कांटे
फौलादी होता जाता है पल पल सन्नाटा गहराया
ऐसे हुआ हाल कल भी था जिसे आज ने फिर दोहराया

मन का कब ईतिहास पढोगे

अनुत्तरित यह प्रश्न अभी तक कब बोलो तुम उत्तर दोगे
तन का तो भूगोल पढ़ लिया, मन का कब ईतिहास पढोगे 
युग बीते पर पाठ्यक्रमों में किया नही परिवर्तन  ​तू मने बने हुए हो बस अतीत के पृष्ठों में होकर के बन्दी मौसम बदले, ऋतुयें बदली, देशकाल की सीमाएं भी किन्तु तुम्हारी अंगनाई  ​की बदली नहीं घिरी   नौचंदी
बिख्री ​ हुइ मान्यताओ के अन्धकूप मे डूबे  हो तुम  बोलो नई  सुबह की अपने मन मे कब उजियास भरोगे ​
सिमटा रहा तुम्हारा दर्शन सिर्फ मेनका उर्वशियो में लोपी, गार्गी, मैत्रेयी को कितना तुमने समझा जाना दुष्यंती स्मृतियां सहेज कर, कच से रहे अर्थसाधक तुम यशोधरा का और उर्मिला का क्या त्याग कभी पहचाना
अनदेख करते आये हो बिम्ब समय के दर्पण वाला कटु यथार्थ की सच्चाई पर, बोलो कब विश्वास करोगे एकाकी जीवन की राहें होती है अतुकांत काव्य सी मन से मन के संबंधों की लय सरगम बन  कर सजती है  सहचर बनने को कर देता जब कोई जीवन को अर्पित पल पल पर सारंगी तब ही साँसों की धुन में बजती है 
जीवन का अध्याय तुम्हारा अर्थ, विषय से रहित गद्य सा इसको करके छंदबद्ध कब अलंकार अनुप्रास जड़ोगे 

तूमन केवल स्वप्न ही दिये

तुमने मुझको स्वप्न कुछ दिए
लेकिन तुमने स्वप्न ही दिए
​नील   गगन के परे सुवासित औ  ​पुष्पित  राहों  ​के  निज पाशों में  रखे बाँध कर हर पल उन  बाहों के  धवल चाँदनी  में अंगड़ाई ले, संदली हवा के  सांस सांस भर तृप्ति प्राप्त करती, बढ़ती चाहों के 
रहा खोजता मैं उत्तर, पर  तुमने केवल प्रश्न ही दिए 
प्रश्न स्वप्न की इस दुनिया का पथ है शुरू कहाँ से जो सभाव्य बताते उसको संभव करे जहाँ से प्रतिबिम्बो के आकारों के आयामों को नापें आदि अंत की रेखाओं का कर दें अंत कहाँ पे
मांगीमाल उत्तरों वाली तुमने मुझको यत्न ही  दिए
यत्न किये निशि वासर इन लंबी राहों पर चलते जिन पर कभी मंज़िलों के साये भी आ न पड़ते होते है आरम्भ, अंत  पर जिनका कही नहीं है और नीड भी संध्या के, पाथेयो में ही ढलते
परिणति की अभिलाषाओं को अंतशेष भी भग्न ही दिए
तूमन केवल स्वप्न ही दिये

रचना करती है अभिनंदन

क्षमता नहीं किसी में सुन ले उसके लेखन में गुंजायश सबका है अपना विज्ञापन
किस रचना को गया सराहा किसने देखे है सम्मेलन कौन शब्द दे करे उजागर किसी हृदय का अन्तर्वेदन  कहाँ कहाँ पर मिला मान है और छपी है कितनी पुस्तक आत्म प्रशंसा के सब  साधन 
किस रचना के योगदान पर कितने मंच रहै है निर्भर किस रचना  का शिल्प आनूठा हावी हुआ सभी के उपर  कितनी हुई संकलित अब तक और संकलन का कितनो के कितनी बार किया संपादन   
बीए एमए पी एच डी की कितनी सनद बटोरी अब तक भाषा औ व्याकरण कहां तक द्वारे आकर देते दस्तक आलोचक आ शीश झुकाते करते हैं साहित्यकार का सांझ सवेरे बस आराधन ऐसे अद्भुत स्वतःप्रशंसक का रचना करती अभिनंदन

बड़ी दूर का सदेशा इ

बड़ी  दूर का सदेशा इक बाँसुरिया की टेर पकड़ कर
गिरती हुई ओस की गति से पुरबा के संग बहता आया 
​गंधों की मचली लहरी की लहर लहर में घुला हुआ सा  सावन की पहली फुहार में भीग भीग कर धुला हुआ सा  ​ क्षिति के सिरे चमकती सोनहली किरणों की आभायें ले  खोल सके मन का वातायन, इस निश्चय पर तुला हुआ सा 
गलियारे   के   द्वार   बंद थे, पहरे लगे हुए राहों में  फिर भी तोड़ सभी बाधाएं धीमे से आँगन में आया 
संदेशों में गुंथी हुई थी मन की कल्पित अभिलाषाएं अक्षर अक्षर में संचित थी युगों युगों कु प्रेम कथाए वासवदत्ता और उदयन की, साथ साथ नल दमयंती की साम्राज्यों की रूप प्रेम के करता आ असीम सीमाएं
जल तरंग के आरोहों के अवरोहो के मध्य कांपती उस ध्वनि की कोमलता में लिपटा लाकर संदेश सुनाया
 बड़ी दूर का संदेशा वह आया था बिन संबोधन के और अंत में हस्ताक्षर भी अंकित नही किसी प्रेषक के  क्या संदेशा मेरे  लिए है या फिर किसी और का भटका उठे अचानक प्रश्न अनगिनत, एक एक कर रह रह कर के
बड़ी दूर का संदेशा।    यह देश काल की सीमाओं से परे ,रहा है किसका, किसकी खातिर है ये समझ न आया

अकेले उतने हैं हम

जितनी संचारों की सुविधा बढी, अकेले उतने हैं हम
केवल साथ दिया करते है अपने ही इक मुट्ठी ​ भर​   गम 
राजमार्ग पर दौड़ रही है उद्वेलित बेतार तरंगें पगडंडी पर अंतर्जाल लगाये बैठा अपने डेरे हाथों में मोबाइल लेकर घूम रहा हर इक यायावर लेकिन फिर भी एकाकीपन रहता है तन मन को घेरे
​घँटी  तो बजती है​ पर आवाज़ न कोई दिल को छूती  मन मरुथल की अंगनाई मे दिखते अपनेपन के बस  भ्रम 
हरकारे के कांधे वाली झोली रिक्त रहा करती है मेघदूत के पंथ इधर से मीलो दूर कही मुड़ जाते पंख पसारे नही कबूतर कोई भी अब नभ में जाकर बोतल के संदेशे लहरों की उंगली को थाम ​ ​  न पाए
दुहराना ​ ​  चाहा ​ ​  अतीत के साधन आज  नई दुनिया में असफल होकर बिखर गए  पर सारे के सारे ​ ही ​  उद्यम 
बडी दूर का संदेशा हो या फिर कोई ​ कही​  निकट का  सुबह ​ उगी   जो आस टूट कर बिखर गई संध्या के ढलते टेक्स्ट फेसबुक ट्विटर फोन ईमेल सभी पर बाढ़ उमड़ती लेकिन कोई एक नही है जिसको हम अपना कह सकते
संचारों के उमड़ रहे  इन  बेतरतीबी  सैलाबों  में सब कुछ बह जाता है, रहती केवल सन्नाटे की सरगम

हार है या जीत मेरी

ज़िन्दगी ने जो दिया वह हार है या जीत मेरी जानता हूँ मैं नही, स्वीकार करता सिर झुकाकर
आकलन आधार है बस दृष्टिकोणों के सिरे का जीत को वे हार समझेंहार को जयश्री बना दें एक ही परिणाम के दो अर्थ जब भी है निकलत ये जरूरी है उन्हें तबहम स्वयं निस्पृह बता दें
सौंपती है ज़िन्दगी वरदान ही तो आजुरी में ये मेरा अधिकार उनको रख सकूं कैसे सजाकर
हार दिखती सामनेही जीत का आधार होती ठोकरों ने ही सिखाया पग संभल रखना डगर में राह की उलझन उगाती  नीड के अंकुर हृदय में और देती है नए  संकल्प  के  पाथेय  कर में