नए अर्थ दे दू शब्दों को


​अनुमति 
अगर तुम्हारी हो तो नए अर्थ दे दू शब्दों कोऔर छंद में उन्हें पिरो कर मैं इक नया गीत लिख डालूँ


बदली की पायल से बिखरी हैं सुर बन कर जो सरगम के
उन्हें कहू मैं चिकुर सिंधु मे छितराये अमोल कुछ मोती
दामिनियों की पेंजनियों से हुई परावर्तित किरणें है
उन्हें नाम दूं उस चितवन का ढली साँझ जो चितवित होती

नए कोष के पृष्ठ अभी तो सारे के सारे हैं कोरे
परिभाषा की नई नई परिभाषा 
से उ​नको रंग डालूँ


चढ़ती हुई रात की  बगिया के सुरमाये से झुरमुट से
तोडू फूल और फिर गूंथू कुछ की वेणी कुछ के गजरे
अम्बर में खींचा करती हैं मन्दाकिनिया जो रांगोली
उसको बना बूटियाँ कर दूं रंग हिनाई ज्यादा गहरे

पुरबा के ​अल्हड झोंके सा लहराता​ यह ​​ गात तुम्हारा
अनुमति दो तो भित्तिचित्र कर इसको अपने स्वप्न सजा लूँ

 उगी धूप  जो  ओससिक्त ​ पाटल  पर करती है  हस्ताक्षर
उसको दे विस्तार बना दूँ एक भूमिका नई ग़ज़ल की 
खिड़की के शीशों पर खिंचती  हुई इंद्रधनुषी रेखाएं 
उन्हें बनाऊं भंगिम स्मितियाँ अधर  कोर से जो हैं छलकी

दिनं के   पन्नों पर दोपहरीसंध्या नाम लिखा करती जो 
अनुमति हो तो उसे तुम्हारा कह कर नव इतिहास बना लूँ 

Comments

Udan Tashtari said…
वाह!!
Nirupama Varma said…
वाह अति सुंदर

Popular posts from this blog

अकेले उतने हैं हम

तुम ने मुझे पुकारा प्रियतम

वीथियों में उम्र की हूँ