तुम न आये




परे हो खिड़कियों के झांकती थी शाख से बदली
लिये थी कामना रंगीन चित्रों की सजा पगली
उमंगों की हिलोरों में उठाती मदभरी लहरें
उतरती दूब पर पाने परस थी पांव का मचली

सजे ही रह गये अगवानियों के थाल,आरति कर न पाये
तुम न आये

सिमट कर रह गया मॄदुप्रीत का अरुणाभ आमंत्रण
निशा के अश्रुओं ने सींच कर महका दिया चन्दन
कसकती रह गईं भुजपाश की सूनी पड़ी साधें
शिथिल ही रह गया द्रुत हो न पाया ह्रदय का स्पंदन

खिड़कियों के पट खुले ही रह गये, फिर भिड़ न पाये
तुम न आये

भिखारिन सेज थी ले आस का रीता पड़ा प्याला
हवायें आतुरा थी चूम पायें गंध की माला
रही निस्तब्धता व्याकुल भरे वह माँग रुनझुन से
निखर कर चान्दनी में रूप की मदमाये मधुशाला

सांझे से सोये पखेरु जग गये फिर चहचहाये
तुम न आये

प्रतीक्षा के दिये का तेल सारा चुक गया जल कर
शमा का मोम विरह की अगन में बह गया गलकर
उबासी ले सितारों ने पलक भी मूँद लीं अपनी
उषा को साथ ले आने लगा रथ सूर्य का चलकर

नैन थे दहलीज पर पलकें बना पांखुर बिछाये
तुम न आये

पढ़ा नहीं है पत्र तुम्हारा

खुला नहीं है बन्द लिफ़ाफ़ा अभी हवा का वन से आकर
इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं कोयल ने गाकर

ये तो है अनुमान मुझे क्या तुमने लिखा पत्र में होगा
एकाकीपन घेरे रहता है यादों के दीप जलाये
और एक आवारा बदली ठहरी हुई नयन के नभ पर
नीर भरी कलसी ढुलकाती है जब भी उसका मन आये

और लिखा होगा असमंजस जो उतरा है मन में आकर
इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं कोयल ने गाकर

आग लगाता मन में,होगा लिखा,यहां जब बरसे सावन
और उमड़ती गंधें चुभती कांटा बन बन कर सीने में
क्रूर पपीहा जाने क्योंकर मुझको अपना राग सुनाये
और शिला जैसी है बोझिल सांस सांस लगता जीने में

शायद ये भी लिखा पीर ही रखती है मुझको बहलाकर
इसीलिये ही पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं बुलबुल ने गाकर

चन्दन की ले कलम शहद में डुबो लिखे होगे जब अक्षर
और शब्द में उभरा होगा नाम स्वत: ही मेरा आकर
चूमी होगी उस पल तुमने सौ सौ बार हथेली अपनी
और पत्र फिर खोला होगा बन्द हुआ फिर से अकुलाकर

भेजा शायद एक फूल भी तुमने उस के साथ लगाकर
अब तक लेकिन पत्र तुम्हारा पढ़ा नहीं मौसम ने गा कर

प्रीत का पहला निमंत्रण

याद आया है मुझे वह प्रीत का पहला निमंत्रण
जो हवा ने गुनगुना कर द्वार पर मेरे पढ़ा था

स्वप्न जो अंगनाईयों में आंख की पलते रहे थे
वो लगा सहसा मुझे, साकार सब होने लगे हैं
और जो असमंजसों के पल खड़े थे, चित्र बन कर
कामना के ज्वार में घिरते हुए खोने लगे हैं

पैंजनी का सुर खनकने लग गया है आज फिर वह
कॄष्ण की जो बासुरी पर राग में ढल कर चढ़ा था

याद फिर आया अधर का थरथराना, मौन वाणी
याद वह संदेश, आये जो हवाओं के परों पर
दॄष्टि की किरणें,पिरोती अक्षरों की गूँथ माला
और मन की बात को रचती हिनाई उंगलियों पर

एक बूटा वह लगा है आज गाने गीत फिर से
पांव के नख से धरा के शाल पर जो आ कढ़ा था

दंत-क्षत पल्लू सुनाने लग गये हैं फिर कहानी
उंगलियों के चिन्ह फिर से छोर पर बनने लगे हैं
फिर किताबों में सुगन्धित हो गये हैं फूल सूखे
और गुलमोहर पुन: अब शाख से झरने लगे हैं

बात करने लग गया है एक वह रूमाल मुझसे
एक दिन जिस पर अचानक होंठ का चुम्बन जड़ा था

फिर संवरने लग गये हैं पात पीपल के सुनहरे
फिर घटाओं ने लिखा है बूँद से सन्देश कोई
फिर पखेरू बन उड़ी है कामना जीवन्त होकर
कल्पना फिर गुनगुनाने लग गई है दूध धोई

आज फिर वह भाव करने लग गया है नॄत्य मन में
जो कभी भुजपाश के पथ पर सहज आगे बढ़ा था

तीन सौवीं प्रस्तुति---सांझ का दिया जला नहीं

सूरज आज भी अपने समय पर ही निकला है और प्राची से ही निकला है, मौसम में भी कोई परिवर्तन नहीं. सब कुछ वैसे का वैसा ही है केवल एक बात अलग है. आज गीत कलश पर यह तीन सौवीं प्रस्तुति है.आपके स्नेह ने प्रेरणा बन कर इस यात्रा में निरन्तर गतिमय रहने का प्रोत्साहन दिया है और वही स्नेह मेरा मार्गदर्शक रहा है. आप सभी को आभार देते हुए प्रस्तुत है

साँझ का दिया जला नहीं


भोर जब हुई तो पंछियों ने गीत गाये थे
रश्मियों के तार छू हवा ने गुनगुनाये थे
पर छली थी दोपहर, सो एक घात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

नीड़ ने बना रखी थी द्वार एक अल्पना
और हाथ में उंड़ेल रंग भर रही हिना
लौट कर कदम दिवस के जब इधर को आयेंगे
पल थके तिवारियों में आ के पसर जायेंगे
सिगड़ियों में आग जागने से मना कर गई
गुड़गुड़ी उठी न जाने किस घड़ी किधर गई
अलगनी पे जो अटक के रह गये थे तौलिये
एक पल में जाने कैसे पाग बन को सो लिये

पांव जो पखारती
आ थकन उतारती
गागरी बिखर के रिक्त इक परात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं, कि रात हो गई

ज़िन्दगी बनी रही अधूरा इक समीकरण
एक संधि पे अटक गई समूची व्याकरण
प्रश्न पत्र में मिले जो प्रश्न थे सभी सरल
पर न जाने क्यों जटिल हुआ सभी का अंत हल
उत्तरों की माल हो गई किताब से पॄथा
लग रहा प्रयत्न जो थे वो सभी हुए वॄथा
देह बांसुरी बनी, न सांस रास कर सकी
और रिक्त झोलियों में आ न आस भर सकी

होंठ खुल सके नहीं
शब्द मिल सके नहीं
जो कही गई, वही अधूरी बात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

याद की किताब के पलटते पॄष्ठ रह गये
जो जले थे दीप साथ, धार में वे बह गये
रोशनी के पक्षपात यूँ हमारे सँग हुए
तीलियाँ उगल गईं जलीं तो पंथ में धुंये
दॄष्टि के वितान पर कुहासे घिर्ते आ रहे
मौन कंठ पाखियों के शून्य गुनगुना गये
उमड़ रही घटाओं में सिमट गया सभी गगन
शांत हो गई उठी अगन भरी हुई लगन

भाग्य रेख चुक गई
ज्योति हो विमुख गई
शह लगी न एक बार और मात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

प्यार था बढ़ा गगन में डोर बिन पतंग सा
सावनी मल्हार में घुली हुई उमंग सा
झालरी बसन्त की बहार की जहाँ उड़ी
आस रह गई ठिठक के मोड़ पे वहीं खड़ी
गंध् उड़ गई हवा में फूल के पराग सी
दोपहर में जेठ के उमगते हुए फ़ाग सी
पतझड़ी हवायें नॄत्य कर गईं घड़ी घड़ी
शाख से गिरी नहीं गगन से बूंद जो झरी

वक्त बीतता रहा
कोष रीतता रहा
ज़िन्दगी बिना दुल्हन की इक बरात हो गई
सांझ का दिया जला नहीं कि रात हो गई

अंधियारे के शब्द कोश में मिलता नहीं सूर्य का परिचय

चढ़ा नकाब व्यस्तताओं का निगल रहा है दिन दोपहरी
और समय के गलियारे में भटक गई कविता कल्याणी

थिरक रहे पांवों में पायल मौन रहे कब हो पाता है
अंधियारे के शब्द कोश में मिलता नहीं सूर्य का परिचय
काई जमे ताल के जल से प्रतिबिम्बित न किरन हो सकी
खुली हाथ की मुट्ठी में कब हो पाता है कुछ भी संचय

तो फिर उथली पोखर जैसे मन में उठे भाव की लहरें
संभव यह तो कभी कल्पना में भी नहीं हुआ पाषाणी

कमल पत्र के तुहिन कणों का हिम बन जाना सदा असम्भव
और मील के पत्थर कब कब तय कर पाते पथ की दूरी
दर्पण की मरमरी गोद में भरते कहां राई के दाने
कहो रंग क्या दोपहरी का कभी हो सका है सिन्दूरी

प्रतिपादित चाणक्य नियम से बंधी रही हो सारा जीवन
सरगम नहीं उंड़ेला करती विष से बुझी हुई वह वाणी

बदला करती नहीं उपेक्षा कभी अपेक्षाओं की चादर
अपना चेहरा ढक लेने से सत्य नहीं ढँक जाया करता
हर मौसम बासन्ती ही हो ये अभिलाषा अर्थहीन है
पतझर को आना ही है तो बिना नुलाये आया करता

गति का नाम निरन्तर चेतनता के संग में लिखा हुआ है
चाहे न चाहे वल्गायें स्वयं थाम लेती हैं पाणी

अपने गीत सुनाता हूं मैं

छन्दों का व्याकरण अपरिचित होकर रहा आज तक हमसे
और गज़ल का बहर काफ़िया, सब कुछ ही रह गया अजाना
काव्य सिन्धु का तीर परे है बहुत हमारी सीमाऒं के
सत्य यही है, क्षमतायें भी सीमित हैं हमने पहचाना
किन्तु ह्रदय की सुप्त भावना में गिर कंकर एक भाव का
शान्त लहर में कोई हलचल सहसा कभी जगा जाता है
तो निस्तब्ध ह्रदय का पाखी मुखरित कर अपनी उड़ान को
अपने स्वर की पीड़ित सरगम को झट से बिखरा जाता है
गूँथ रखे हूं सरगम के मैं वो ही स्वर अपने शब्दों मे
और उन्हीं को समो कंठ में अपने गीत सुनाता हूं मैं
मंदिर की चौखट पर बिखरे हुए फूल की क्षत पंखुड़ियां
रिसता हुआ उंगलियों में से बून्द बून्द कर अभिमंत्रित जल
आशंका से ग्रस्त दीप की थर थर होती कंपित इक लौ
डगमग होता हुआ धुंआसी हुई आस्थाओं का सम्बल
शीश तिलक के पीछे अंकित चुपे हुए अनबूझ सन्देसे
और आरती का स्वागत या विदा प्रश्न पर उलझे रहना
अगरु धूम्र में लिपटे लिपटे छितरा जाती हुई आस का
रह रह कर अपनी सीमा में छुपते हुए मौन हो रहना
ये जो भाव दूर ही रहते आये देव चरण से अक्सर
इन सबको समेट कर अपने संग में, अर्घ्य चढ़ाता हूँ मैं
पांवों की ठोकर से बिखरे हुए देहरी पर के अक्षत
पूजा की चौकी पर नव ग्रह के प्रतीक भी बन जाते हैं
रंग अलक्तक के लेते हैं करवट जब अंगड़ाई लेकर
रोली बन कर देव-भाल की सज्जा बन कर सज जाते हैं
खंड खंड जो कर देती है एक शिला को वह ही छैनी
डूब प्रीत में, सुघड़ शिल्प की प्रतिमा को निखार देती है
बिखरे हुए संतुलन से जो ढली शोर में, वे आवाज़ें
कभी कभी वंशी पर चढ़ कर सरगम को संवार देती हैं
सहज विरोधाभास ज़िन्दगी के जो कदम कदम पर बिखरे
उठा उन्हें भर कर बाँहों में अपने अंक लगाता हूँ मैं
उंगली एक छूट कर मुट्ठी से खो जाती है मेले में
और निगाहें वे जो लौटीं वापिस हर द्वारे से टकरा
स्वर वे उपजे हुए कंठ के जिन्हें न पथ में कोई रोके
और आस के फूल पांखुरी रह जाती हैं जिनकी छितरा
वह सांसों की डोर न थामें जिसको कभी हवा के झोंके
और धड़कने वे जिनकी गति अवरोधों से ग्रस्त हुई है
निशि के अंतिम एक सितारे कीज बिखराती हुई रश्मियाँ
सूरज की अगवानी होती देख स्वयं ही अस्त हुई हैं
रहे उपेक्षित इतिहासों की गाथाओं की नजरों से जो
आज उन्हीं को ढाल शब्द में गाथा एक सुनाता हूँ मैं

बदल देता दिशायें

पांव गतिमय, बढ़ रहीं हैं दूरियाँ गंतव्य से पर हर कदम पर कोई रह रह कर बदल देता दिशायें   भोर का निश्चय थमाता है  ​ सजा ​ पाथेय जितना...